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मनु

तुम से किये वादों की परछाईयाँ, मेरे लिए राहें बनती चली गईं।
उन वादों की गिरहें बाँध ली थी मैंने, बस उन्हीं को थामकर इस ज़िंदगी की रस्सी पर संभलकर चलते हुए ही यहाँ तक पहुंची हूँ।
अपने इस प्यार को पूजा बनाने के लिए आहुति तो देनी ही थी।

खामोशियों की आवाजें,इतनी तेज़ क्यों होती हैं, मेरी तन्हाई के पास,तेरा ख्याल ठहरा क्यों होता है मेरी जिंदगी की किताब के हर पन्ने पर,क्यों लिखा है तेरा नाम नंबरों की तरह तेरे साथ बीता दिन सर्दियों के दिन सा,इतना सिकुड़ा हुआ क्यों होता है तेरे जाते ही वो ही दिन,गर्मी के दोपहर सा गहरा क्यों होता है मेरी रात के सिहराने पर,तेरी सिलवटें क्यों होती हैं,मेरी सुबहों पर तेरा,पहरा क्यों होता है बारिशों की चाप में तेरी,आवाज़ क्यों होती है,कोई भी वादी हो,उस पर तेरा,कोहरा क्यों होता है कहीं भी जाऊं,कहीं भी रहूँ,भीड़ का हर चेहरा,तेरा चेहरा क्यों होता है
-मनु

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तार्रुफ़

ख़ुद के पास ख़ुदका तार्रुफ़ सब से कम होता है खुद के बारे में लिखना और भी मुश्किल ... क्यूंकि खुद को कौन पूरी तरह दिखता है आँसमा से बाते करने का शौक बचपन से ही रहा खेल तेजी तेहुए ज़िन्दगी मिलती है तो जीई भी जाती है

सच पूछोतो उतनी जितनी "याद" रहती है जन्म की पहचान देहरादून तालीम की बात करें तो पोस्टग्रेजुएट कुछ तकनीकी तालीम कुछ नया तराशने का हुनर लेकिन आखिर में जीत सपनो की हुई जो ख़याल बनकर ठहरे और लव्ज़ बन कर कागजों पर जड़ गए दो नाम जो सुने गए पढ़े गए जिए गए

-मनु

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ज़िन्दगी जब बहती है तब पानी पर भी कदमो के निशाँ बनाती हुई चलती है, उम्र पर एक दौर ऐसा ज़रूर आता है, जिसमे ज़हन हर लम्हा परवाज़ भरता है कहीं ये नदी की तरह गुज़र जाता है, कहीं बर्फ की झील साजम जाता है, जहाँ ये झील है वहाँ रिसता रहता है, पिघलता रहता है न बहता है पूरी तरह और न थमता है, उन साँसों की तरह जो जाकर लौटती रहती हैं, ऐसे ही तुम्हारी ख़ामोशी में एक झील बनकर मौजूद हूँ मैं -मनु

वादों की परछाईयाँ

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वादों की परछाईयाँ किताब विमोचन कार्यक्रम

जज़्बात

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वो ख़्याल

जो तेरी

रहगुज़र से हो कर गुज़रे

बस

वही जज़्बात है

... बस

वही

जज़्बात है

-मनु

जज़्बात किताब विमोचन कार्यक्रम

दोस्त और मैं

जज़्बात

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